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Shloka 33

Vidurā–Putra Saṃvāda: Utsāha, Kīrti, and Kṣātra Resolve

Udyoga-parva 131

इतो दुःखतरं कि नु यदहं हीनबान्धवा । परपिण्डमुदीक्षे वै त्वां सूत्वामित्रनन्दन,शत्रुओंका आनन्द बढ़ानेवाले पाण्डव! इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या हो सकती है कि मैं तुम्हें जन्म देकर भी बन्धु-बान्धवोंसे हीन नारीकी भाँति जीविकाके लिये दूसरोंके दिये हुए अन्न-पिण्डकी आशा लगाये ऊपर देखती रहती हूँ

「これ以上の苦しみがあろうか——私は縁者の支えを失い、頼る者なき女のように、生きるために他人の施す一口の食を仰ぎ見て待たねばならぬ。おお、パーンドゥの子よ、敵の歓びを増す者よ! 汝を産んだというのに、なお他人の糧を望む身となったのだ。」

वायुदेव उवाच