Adhyāya 12: Devas’ Petition to Nahūṣa; Bṛhaspati on Śaraṇāgata-Dharma; Indrāṇī’s Strategic Delay
मोघमन्नं विन्दति चाप्यचेता: स्वर्गाल्लोकाद् भ्रश्यति नष्टचेष्ट: । भीतं प्रपन्न॑ प्रददाति यो वै न तस्य हव्यं॑ प्रतिगृह्नन्ति देवा:,“जो भयभीत शरणागतको शत्रुके हाथमें सौंप देता है, वह दुर्बलचित्त मानव जो अन्न ग्रहण करता है, वह व्यर्थ हो जाता है। उसके सारे उद्यम नष्ट हो जाते हैं और वह स्वर्गलोकसे नीचे गिर जाता है। इतना ही नहीं, देवतालोग उसके दिये हुए हविष्यको स्वीकार नहीं करते हैं
mogham annaṁ vindati cāpy acetāḥ svargāl lokād bhraśyati naṣṭaceṣṭaḥ | bhītaṁ prapannaṁ pradadāti yo vai na tasya havyaṁ pratigṛhṇanti devāḥ ||
「怯えて帰依して来た者を敵に引き渡す者は、心の弱き人であり、口にする食もむなしく、企てはことごとく潰え、天界より墜ちる。さらに、神々はその捧げる供犠の供物(ハヴィス)を受け取らぬ。」
शल्य उवाच