अभिमन्युविलापः (Abhimanyu-vilāpa) — Uttarā’s lament, observed and framed by Gandhārī
मातड़'भुजवर्ष्माणौ ज्याक्षेपकठिनत्वचौ । काज्चनाज्दिनौ शेते निक्षिप्प विपुलौ भुजी,“जो हाथीकी सूँड़के समान बड़ी हैं, निरन्तर प्रत्यंचा खींचनेके कारण रगड़से जिनकी त्वचा कठोर हो गयी है तथा जो सोनेके बाजूबन्द धारण करते हैं, उन विशाल भुजाओंको फैलाकर आप सो रहे हैं
「象の鼻のように大きなその両腕は、絶えず弓弦を引き絞った摩擦で皮膚が硬くなり、黄金の腕輪に飾られていました。けれど今は、その広い腕を投げ出して横たわっておられる。」
वैशम्पायन उवाच