Book 12, Chapter 93 — Vāmadeva’s Counsel to King Vasumanā on Dharmic Kingship (धर्मप्रधान-राजधर्मोपदेशः)
यस्य नास्ति गुरुर्थर्मे न चान्यानपि पृच्छति । सुखतलन्त्रो$र्थलाभेषु न चिरं सुखमश्लुते,जिसको धर्मके विषयमें शिक्षा देनेवाला कोई गुरु नहीं है और जो दूसरोंसे भी कुछ नहीं पूछता है तथा धन मिल जानेपर सुखभोगमें आसक्त हो जाता है, वह दीर्घकालतक सुख नहीं भोग पाता है
法(ダルマ)において教え導く師を持たず、また他者にも問わぬ者は、財を得るや享楽に溺れるゆえ、久しく幸福を味わうことはできない。
वामदेव उवाच