Varṇa-dharma and Rājadharma: Yudhiṣṭhira’s Inquiry and Bhīṣma’s Normative Outline (वर्णधर्म-राजधर्म-प्रश्नोत्तरम्)
दुश्वैष्टितं च विविध॑ वृत्तिश्वैवानुवर्तिनाम् । शड्कितत्वं च सर्वस्य प्रमादस्य च वर्जनम्,भाँति-भाँतिकी दुश्चेष्ठा, अपने सेवकोंकी जीविकाका विचार, सबके प्रति सशडक रहना, प्रमादका परित्याग करना, अप्राप्त वस्तुको प्राप्त करना, प्राप्त हुई वस्तुको सुरक्षित रखते हुए उसे बढ़ाना और बढ़ी हुई वस्तुका सुपात्रोंको विधिपूर्वक दान देना--यह धनका पहला उपयोग है। धर्मके लिये धनका त्याग उसका दूसरा उपयोग है, कामभोगके लिये उसका व्यय करना तीसरा और संकट-निवारणके लिये उसे खर्च करना उसका चौथा उपयोग है। इन सब बातोंका उस ग्रन्थमें भलीभाँति वर्णन किया गया है
duṣvaiṣṭitaṃ ca vividhaṃ vṛttiś caivānuvartinām | śaṅkitatvaṃ ca sarvasya pramādasya ca varjanam ||
ビーシュマは言った。「思慮を欠いた企てや道を誤った営みの数々を避けよ。生業もまた、自らの力と身分にふさわしく整えるべきである。万人に対して慎重に警戒し、怠慢を捨てよ。このような規律—周到な計画、用心、そして不注意からの解放—こそが、財を正しく用い守る礎であり、未得のものを得、既得のものを保ち増し、やがて増えた財を、法にかなって相応しき器へと施すための道である。」
भीष्म उवाच