कालनिर्देशः शोकनिवारणं च
Instruction on Kāla and the Removal of Grief
अनृतेनोपवर्ती च प्रतिरोद्धा गुरोस्तथा । एतान्येनांसि सर्वाणि व्युत्क्रान्तसमयश्नल यः:,कुन्तीनन्दन! इसके सिवा परिवेत्ता (बड़े भाईके अविवाहित रहते हुए विवाह करनेवाला छोटा भाई), परिवित्ति (परिवेत्ताका बड़ा भाई), ब्रह्महत्यारा और जो दूसरोंकी निन्दा करनेवाला है वह तथा छोटी बहिनके विवाहके बाद उसकी बड़ी बहिनसे ब्याह करनेवाला, जेठी बहिनके अविवाहित रहते हुए ही उसकी छोटी बहिनसे विवाह करनेवाला, जिसका व्रत नष्ट हो गया हो वह ब्रह्मचारी, द्विजकी हत्या करनेवाला, अपात्रको दान देनेवाला, सुपात्र ब्राह्मणको दान न देनेवाला, ग्रामका नाश करनेवाला, मांस बेचनेवाला तथा जो आग लगानेवाला है, जो वेतन लेकर वेद पढ़ानेवाला एवं स्त्री और शूद्रका वध करनेवाला है, इनमें पीछेवालोंसे पहलेवाले अधिक पापी हैं तथा पशु-वध करनेवाला, दूसरोंके घरमें आग लगानेवाला, झूठ बोलकर पेट पालनेवाला, गुरुका अपमान और सदाचारकी मर्यादाका उल्लंघन करनेवाला--ये सभी पापी माने गये हैं। इन्हें प्रायश्रित्त करना चाहिये
anṛtenopavartī ca pratiroddhā guros tathā | etāny enāṁsi sarvāṇi vyutkrāntasamayaś ca yaḥ, kuntīnandana |
ヴィヤーサは言った。「クンティの子よ、偽りによって生計を立てる者、師を妨げ、あるいは師に逆らう者—これら、またそれに類する一切の行いは罪である。同様に、正しい行いと定められた作法の公認された限界を踏み越える者は、罪人として数えられる。」
व्यास उवाच
The verse identifies key moral transgressions—especially living by falsehood and obstructing or disrespecting one’s teacher—and frames them as serious sins, emphasizing that dharma depends on truthfulness and honoring established ethical boundaries (samaya).
In Śānti Parva’s dharma-instructional setting, Vyāsa addresses Kuntī’s son (Yudhiṣṭhira), listing and classifying wrongful behaviors as part of a broader ethical discourse on sin, conduct, and the need for atonement.