अध्याय ३३७ — ज्ञानमार्ग-वैविध्यप्रश्नः तथा व्यासस्य नारायणोद्भवकथा
Systems of Knowledge and Vyāsa’s Nārāyaṇa-Origin
स राजा राजशार्दूल सत्यधर्मपरायण: । अन्तर्भूमिगतश्वैव सततं धर्मवत्सल:,नृपश्रेष्ठी सदा धर्मपर अनुराग रखनेवाले सत्यधर्मपरायण राजा उपरिचर भूमिके भीतर प्रवेश करके भी निरन्तर नारायण-मन्त्रका जप करते हुए भी उन्हींकी आराधनामें तत्पर रहते थे। अतः उन्हींकी कृपासे वे पुन: ऊपरको उठे और भूतलसे ब्रह्मलोकमें जाकर उन्होंने परम गति प्राप्त कर ली। अनायास ही उन्हें निष्ठावानोंकी यह उत्तम गति प्राप्त हो गयी
sa rājā rājaśārdūla satyadharmaparāyaṇaḥ | antarbhūmīgataś caiva satataṃ dharmavatsalaḥ ||
その王は—王たちの虎—真実とダルマに全身全霊を捧げ、つねに正義を愛した。たとえ地の底へ入った後も、彼は絶えずダルマに心を向け、信愛の礼拝を続けた。神の恩寵によって彼は再び浮上し、地上を去って梵天界(Brahmaloka)に至り、至上の目的を得た—揺るがぬ者に労せずして与えられる、最上の帰趣である。
देव उवाच