पितृयज्ञे नारायणतत्त्वम् — The Nārāyaṇa Grounding of Ancestral Offerings
ततः स प्राड्मुखो विद्वानादित्ये नचिरोदिते । पाणिपादं समादाय विनीतवदुपाविशत्,थोड़ी ही देरमें जब सूर्योदय हुआ, तब ज्ञानी शुकदेव हाथ-पैर समेटकर विनीतभावसे पूर्व दिशाकी ओर मुँह करके बैठे और योगमें प्रवृत्त हो गये। उस समय बुद्धिमान् व्यास- नन्दन जहाँ योगयुक्त हो रहे थे, वहाँ न तो पक्षियोंका समुदाय था, न कोई शब्द सुनायी पड़ता था और न दृष्टिको आकृष्ट करनेवाला कोई दृश्य ही उपस्थित था
tataḥ sa prāṅmukho vidvān āditye nacirodite | pāṇipādaṃ samādāya vinītavad upāviśat ||
ビーシュマは言った。「やがてその学識ある者は、日が昇り始めたばかりの時、東に面し、手足を引き寄せて、謙虚な落ち着きのうちに坐した。かくして身心を整え、彼はヨーガに入った—黎明の吉祥なる刻に、内なる静寂と自己統御を求めて。」
भीष्म उवाच