नरनारायण-नारदसंवादः
Nara-Nārāyaṇa–Nārada Discourse on Vision, Elements, and Entry into Vāsudeva
पुत्रदारैर्महान् क्लेशो विद्याम्नाये महान् श्रम: । कि नु स्याच्छाश्व॒तं स्थानमल्पक्लेशं महोदयम्,वे सोचने लगे, स्त्री-पुत्रोंके झमेलेमें पड़नेसे महान् क्लेश होगा। विद्याभ्यासमें भी बहुत अधिक परिश्रम है। कौन-सा ऐसा उपाय है, जिससे सनातन पद प्राप्त हो जाय। उस साधनमें क्लेश तो थोड़ा हो, किन्तु अभ्युदय महान् हो
putradārair mahān kleśo vidyāmnāye mahān śramaḥ | ki nu syāc chāśvataṃ sthānam alpakleśaṃ mahodayam ||
ナーラダは言った。「妻子へのもつれに身を投じれば、苦悩は甚だ大きい。学びを求め、またそれを伝えるにも、労苦はまた大きい。では、いかなる方便によって永遠の境地に至れるのか—艱難は少なく、しかも霊的な高揚と真の繁栄が大いなる道はどれか。」
नारद उवाच