अव्यक्त-गुण-पुरुषविवेकः | Avyakta, Guṇas, and Discrimination of Puruṣa
निस्तर्तव्यान्यथैतानि सर्वाणीति नराधिप । मन्यते<यं हाबुद्धत्वात् तथैव सुकृतान्यपि,इस प्रकार प्रकृतिकी प्रेरणासे स्वभावत: सुख-दुःखादि द्वन्द्"ोंकी सदा पुनरावृत्ति होती रहती है; किंतु जीवात्मा अज्ञानवश यह मान बैठता है कि ये सारे द्वन्द्ध मुझपर ही धावा करते हैं और मुझे इनसे निस्तार पानेकी चेष्टा करनी चाहिये। (ऐसा मानकर वह दुखी होता है) नरेश्वर! प्रकृतिसे संयुक्त हुआ पुरुष अज्ञानवश यह मान लेता है कि मैं देवलोकमें जाकर अपने समस्त प्रण्योंक फलका उपभोग करूँगा और पूर्वजन्मके किये हुए शुभाशुभ कर्मोंका जो फल प्रकट हो रहा है, उसे यहीं भोगूँगा
vasiṣṭha uvāca |
nistartavyāny athaitāni sarvāṇīti narādhipa |
manyate ’yaṃ hābuddhatvāt tathaiva sukṛtāny api ||
ヴァシシュタは言った。「人々の主よ、ただ理解の欠如ゆえに、彼はこれら一切の境遇と対の相を『渡り越えて』逃れねばならぬと思い、功徳の行いについてさえ同じように考える。こうしてプラクリティに駆られ、楽と苦などの対立はその惰力によって繰り返されるのに、個我は無明ゆえそれを『我』への襲撃と受け取り、あわてて超えようとする。さらにプラクリティと結びついた者は、『天界に赴き、あらゆる行為の果を享受するのだ』『過去の善悪の業が現れ出た果報はここで受けねばならぬ』と妄想し、その誤認によって自らを悲苦に縛りつける。」
वसिष्ठ उवाच