Adhyātma–Adhibhūta–Adhidaivata Correspondences and the Triguṇa Lakṣaṇas (Śānti-parva 301)
आत्मना विप्रहीणानि काष्ठकुड्यसमानि तु । विनश्यन्ति न संदेह: फेना इव महार्णवे,जैसे महासागरमें उठे हुए फेन नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार जीवात्मासे परित्यक्त होनेपर मनुष्यकी काठ और दीवारकी भाँति जड इन्द्रियाँ प्रकृतिमें विलीन हो जाती हैं, इसमें संदेह नहीं है
「我(アートマン)を失えば、諸根は木片や壁のように、ただの無知覚のものとなる。疑いなくそれらは滅し、プラクリティ(自然)へと融け入る。大海に起こる泡が消え去るように。」
भीष्म उवाच