Haṃsa–Sādhya Saṃvāda: Satya, Dama, Kṣamā and the Discipline of Speech
आहारसंचयाश्षैव तथा कीटपिपीलिका: । असक्ता: सुखिनो लोके सक्ताश्चैव विनाशिन:,“मुक्त पुरुष सुखी होते हैं और संसारमें निर्भय होकर विचरते हैं; किंतु जिनका चित्त विषयोंमें आसक्त होता है, वे कीड़े-मकोड़ोंकी भाँति आहारका संग्रह करते-करते ही नष्ट हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है; अतः जो आसक्तिसे रहित हैं, वे ही इस संसारमें सुखी हैं। आसक्त मनुष्योंका तो नाश ही होता है!
āhārasañcayāś caiva tathā kīṭapipīlikāḥ | asaktāḥ sukhino loke saktāś caiva vināśinaḥ ||
ビーシュマは言った。「食を蓄え続ける虫や蟻のように、欲境に執する者は、その執着ゆえに滅びる。だが執着なき者は、世を安らかに、恐れなく歩む。ここで真に幸福なのは彼らのみである。執着する者の末路は破滅だ。」
भीष्म उवाच