अध्याय २८६ — पराशर-उपदेशः
Ethical Restraint, Mortality, and Karma
यदा न शोचेमहि कि नु नः स्थाद् धर्मेण वा नारद कर्मणा वा । कृतान्तवश्यानि यदा सुखानि दुःखानि वा यन्न विधर्षयन्ति,नारदजी! जब अज्ञान दूर हो जानेके कारण हम शोक ही नहीं करते हैं तो धर्म अथवा लौकिक कर्मसे हमारा क्या प्रयोजन है। सारे सुख और दुःख कालके अधीन होनेके कारण क्षणभंगुर हैं, अत: वे ज्ञानी पुरुषको पराभूत नहीं कर सकते हैं
samaḍa uvāca |
yadā na śocemahi ki nu naḥ syād dharmeṇa vā nārada karmaṇā vā |
kṛtāntavaśyāni yadā sukhāni duḥkhāni vā yan na vidhārṣayanti ||
サマダは言った。「ナラダよ、無明が払われ、もはや嘆かぬとき、我らに法(ダルマ)—あるいは世の営み—が何の用があろうか。快も苦も時(死)の支配に属し、はかなく消える。ゆえに、それらは悟りある者を屈せしめ得ぬ。」
समड़ उवाच