अध्याय २८६ — पराशर-उपदेशः
Ethical Restraint, Mortality, and Karma
/ भीकम (2 अमान षडशीर्त्याधिकद्विशततमो< ध्याय: समड़के द्वारा नारदजीसे अपनी शोकहीन स्थितिका वर्णन युधिछिर उवाच शोकाद् दुःखाच्च मृत्योश्च त्रसन्ते प्राणिन: सदा । उभयं नो यथा न स्यात् तन्मे ब्रूहि पितामह,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! संसारके सभी प्राणी सदा शोक, दुःख और मृत्युसे डरते रहते हैं; अतः आप हमें ऐसा उपदेश दें, जिससे हमलोगोंको उन दोनोंका भय न रहे
yudhiṣṭhira uvāca | śokād duḥkhāc ca mṛtyoś ca trasante prāṇinaḥ sadā | ubhayaṃ no yathā na syāt tan me brūhi pitāmaha ||
ユディシュティラは言った。「祖父よ、世のあらゆる生きとし生けるものは、常に悲嘆と苦しみと死を恐れております。どうか、その恐れ——その両方——がもはや我らに起こらぬようにする教えをお示しください。」
युधिछिर उवाच