अध्याय २८१ — दानधर्मः, न्यायागतधनम्, ऋणत्रय-परिशोधनं च
Dāna ethics, lawful wealth, and settling obligations
तमियं यास्यति क्षिप्रंं तत्रैव च निवत्स्यति । तथा वो भविता मोक्ष इति सत्यं ब्रवीमि व:,ब्रह्माजीने कहा--जो मनुष्य अपनी बुद्धिकी मन्दतासे मोहित होकर जलमें तुच्छ बुद्धि करके तुम्हारे भीतर थूक, खँखार या मल-मूत्र डालेगा, तुम्हें छोड़कर यह ब्रह्महत्या तुरंत उसीपर चली जायगी और उसीके भीतर निवास करेगी। इस प्रकार तुमलोगोंका ब्रह्महत्यासे उद्धार हो जायगा, यह मैं सत्य कहता हूँ
tam iyaṁ yāsyati kṣipraṁ tatraiva ca nivatsyati | tathā vo bhavitā mokṣa iti satyaṁ bravīmi vaḥ ||
ビーシュマは言った。「その罪は速やかにおまえたちを離れ、まさにそこ――その者の内――に住みつく。かくしておまえたちはそれから解放される。これを真実として告げる。」
भीष्म उवाच