पापात्म-धर्मात्म-लक्षणम् तथा निर्वेदेन मोक्षमार्गः | Marks of the Sinful and the Righteous; Dispassion (Nirveda) as a Path to Liberation
एतद् विचिन्तितं तावत् पुत्रस्य पितृगौरवम् । पिता नालल््पतरं स्थान चिन्तयिष्यामि मातरम्,'पुत्रके निकट पिताका कितना गौरव होना चाहिये, इस बातपर पहले विचार किया है। विचार करनेसे यह बात स्पष्ट हो गयी कि पिता पुत्रके लिये कोई छोटा-मोटा आश्रय नहीं है। अब मैं माताके विषयमें सोचता हूँ
etad vicintitaṃ tāvat putrasya pitṛgauravam | pitā nālpataraṃ sthānaṃ cintayiṣyāmi mātaram ||
ビーシュマは言った。「これまで私は、子の生における父の威厳と重みを思索してきた。省みれば明らかである。父は子にとって取るに足らぬ支えでも、些末な避難所でもない。今度は母についても考察しよう。」
भीष्म उवाच