पापात्म-धर्मात्म-लक्षणम् तथा निर्वेदेन मोक्षमार्गः | Marks of the Sinful and the Righteous; Dispassion (Nirveda) as a Path to Liberation
अफ्-४-क+ षट्षष्ट्यधिकद्वधिशततमो< ध्याय: महर्षि गौतम और चिरकारीका उपाख्यान--दीर्घकालतक सोच-विचारकर कार्य करनेकी प्रशंसा युधिछिर उवाच कथं कार्य परीक्षेत शीघ्रं वाथ चिरेण वा । सर्वथा कार्यदुर्गेडस्मिन् भवान् न: परमो गुरु:,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! आप मेरे परम गुरु हैं। कृपया यह बतलाइये कि यदि कभी सर्वथा ऐसा कार्य उपस्थित हो जाय, जो गुरुजनोंकी आज्ञाके कारण अवश्य कर्तव्य हो, परंतु हिंसायुक्त होनेके कारण दुष्कर एवं अनुचित प्रतीत होता हो तो ऐसे अवसरपर उस कार्यकी परख कैसे करनी चाहिये? उसे शीघ्र कर डाले या देरतक उसपर विचार करता रहे
Yudhiṣṭhira uvāca: kathaṁ kāryaṁ parīkṣeta śīghraṁ vātha cireṇa vā | sarvathā kārya-durge ’smin bhavān naḥ paramo guruḥ ||
ユディシュティラは言った。「行うべきことは、いかに吟味すべきでしょうか—速やかに成すべきか、それとも長く熟慮してから成すべきか。この“なすべきこと”を決する難事において、あなたは私の最高の師です。どうか我らに教え示してください。」
युधिछिर उवाच