Adhyāya 262: Śabda-brahman, Para-brahman, and the Ethics of Tyāga
Kapila–Syūmaraśmi Saṃvāda
नमो ब्राह्मणयज्ञाय ये च यज्ञविदो जना: । स्वयज्ञं ब्राह्मणा हित्वा क्षत्रयज्ञमिहास्थिता:,विप्र! ब्राह्मणोंके लिये जिस यज्ञका विधान है, उसको तो मैं नमस्कार करता हूँ और जो लोग उस यज्ञको ठीक-ठीक जानते हैं, उनके चरणोंमें भी मस्तक झुकाता हूँ, किंतु खेद है, इस समय ब्राह्मणलोग अपने यज्ञका परित्याग करके क्षत्रियोचित यज्ञोंके अनुष्ठानमें प्रवृत्त हो रहे हैं
namo brāhmaṇayajñāya ye ca yajñavido janāḥ | svayajñaṃ brāhmaṇā hitvā kṣatrayajñam ihāsthitāḥ, vipra! |
「婆羅門の本分たる祭(ブラーフマナのヤジュニャ)に敬礼し、また祭祀を真に知る人々にも敬礼する。だが、婆羅門よ、嘆かわしいことに、ここでは婆羅門たちが自らの正しい祭法を捨て、刹帝利にふさわしい儀礼と営みに走っている——己のダルマを離れ、他者のダルマへと向かっているのだ。」
चुलाधार उवाच