Dharma-Pramāṇa-Vicāra: The Elusiveness of Dharma and the Limits of Rule-Lists
स्वपतां जाग्रतां चैष सर्वेषामात्मचिन्तितम् | प्रधानाद्वैधमुक्तानां जहतां कर्मजं रज:,जो अपने मनमें चिन्तित कर्मजनित रजोगुणका अर्थात् रजोगुणजनित काम आदिका योगबलसे परित्याग कर देते हैं तथा जो प्रकृतिके तादात्म्यभावसे भी मुक्त हैं, उन सभी योगपरायण योगी पुरुषोंका जीवात्मा जैसे दिनमें वैसे रातमें, जैसे रातमें वैसे दिनमें सोते- जागते समय निरन्तर उनके वशमें रहता है
svapatāṁ jāgratāṁ caiṣa sarveṣām ātma-cintitam | pradhānād vaidhā-muktānāṁ jahatāṁ karma-jaṁ rajaḥ ||
ヴィヤーサは言った。行為より生じるラジャス—欲望など—をヨーガの力によって捨て去り、さらにプラダーナ(原初の自然)との同一視からも解き放たれたヨーギーたちにとって、自己は常に彼らの支配のもとに堅くとどまる。眠りにおいても覚醒においても、昼も夜も、心がいかなる状態に携わっていようとも同じである。
व्यास उवाच