Adhyāya 222 — ब्रह्मस्थानप्राप्ति: मोक्षधर्मे समत्वव्रतम्
Attaining the Brahman-Station: The Vow of Equanimity in Mokṣadharma
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १८ “लोक: हैं) द्वाविशर्त्याधिकद्विशततमो< ध्याय: सनत्कुमारजीका ऋषियोंको भगवत्स्वरूपका उपदेश देना युधिछिर उवाच केचिदाहुर्द्धिजा लोके त्रिधा राजन्ननेकधा । न प्रत्ययो न चान्यच्च दृश्यते ब्रह्म नैव तत् ।। नानाविधानि शास्त्राणि युक्ताश्वव पृथग्विधा: । किमधिष्ठाय तिष्ठामि तन्मे ब्रूहि पितामह ।। युधिष्ठिरने पूछा--राजन्! जगत्में कुछ विद्वान जड और चेतन अथवा प्रकृति और पुरुष दो तत्त्वोंका प्रतिपादन करते हैं। कुछ लोग जीव, ईश्वर और प्रकृति--इन तीन तत्त्वोंका वर्णन करते हैं और कितने ही विद्वान् अनेक तत्त्वोंका निरूपण करते रहते हैं; अतः कहीं न विश्वास किया जा सकता है, न अविश्वास। इसके सिवा वह परब्रह्म परमात्मा दिखायी नहीं देता है। नाना प्रकारके शास्त्र हैं और भिन्न-भिन्न प्रकारसे उनका वर्णन किया गया है; इसलिये पितामह! मैं किस सिद्धान्तका आश्रय लेकर रहूँ, यह मुझे बताइये ।। भीष्म उवाच स्वे स्वे युक्ता महात्मान: शास्त्रेषु प्रभविष्णव: । वर्तन्ते पण्डिता लोके को विद्वान कश्न पण्डित: ।। भीष्मजीने कहा--राजन! शास्त्रोंके विचारमें प्रभावशाली सभी महात्मा अपने-अपने सिद्धान्तके प्रतिपादनमें स्थित हैं। ऐसे पण्डित इस जगतमें बहुत हैं; परंतु उनमें वास्तवमें कौन तत्त्वको जाननेवाला विद्वान है और कौन शास्त्रचर्चामें पण्डित है? यह कहना कठिन है ।। सर्वेषां तत्त्वमज्ञाय यथारुचि तथा भवेत् | अस्मिन्नर्थ पुराभूतमितिहासं पुरातनम् ।। महाविवादसंयुक्तमृषीणां भावितात्मनाम् | सबके तत्त्वको भलीभाँति समझकर जैसी रुचि हो, उसीके अनुसार आचरण करे। इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास प्रसिद्ध है। एक समय बहुत-से भावितात्मा मुनियोंका इसी विषयको लेकर आपसमें बड़ा भारी वाद-विवाद हुआ था ।। हिमवत्पाश्व॑ आसीना ऋषय: संशितव्रता: ।। षण्णां तानि सहस्राणि ऋषीणां गणमाहितम् | हिमालय पर्वतके पार्श्रभागमें कठोर व्रतका पालन करनेवाले छ: हजार ऋषियोंकी एक बैठक हुई थी ।। तत्र केचिद् ध्रुवं॑ विश्व सेश्वरं तु निरीश्वरम् | प्राकृतं कारणं नास्ति सर्व नैवमिदं जगत् ।। उनमेंसे कुछ लोग इस जगतको ध्रुव (सदा रहनेवाला) बताते थे, कुछ इसे ईश्वरसहित कहते थे और कुछ लोग बिना ईश्वरके ही जगतकी उत्पत्तिका प्रतिपादन करते थे। कुछ लोगोंका कहना था कि इसका कोई प्राकृत कारण नहीं है तथा कुछ लोगोंका मत यह था कि वास्तवमें इस सम्पूर्ण जगत्की सत्ता है ही नहीं ।। अनेन चापरे विप्रा: स्वभावं॑ कर्म चापरे । पौरुषं कर्म दैवं च यत् स्वभावादिरेव तम् ।। इसी प्रकार दूसरे ब्राह्मणोंमेंसे कुछ लोग स्वभावको, कितने ही कर्मको, बहुतेरे पुरुषार्थको, दूसरे लोग दैवको और अन्य बहुत-से लोग स्वभाव-कर्म आदि सभीको जगत्का कारण बताते थे ।। नानाहेतुशतैर्युक्ता नानाशास्त्रप्रवर्तका: । स्वभावाद् ब्राह्मणा राजज्जिगीषन्त: परस्परम् ।। वे नाना प्रकारके शास्त्रोंके प्रवर्तक थे तथा अनेक प्रकारकी सैकड़ों युक्तियोंद्वारा अपने मतका पोषण करते थे। राजन! वे सभी ब्राह्मण स्वभावसे ही इस शास्त्रार्थमें एक दूसरेको पराजित करनेकी इच्छा करते थे ।। ततस्तु मूलमुद्धूतं वादिप्रत्यर्थिसंयुतम् । पात्रदण्डविघातं च वल्कलाजिनवाससाम् ।। एके मन्युसमापतन्नास्तत: शान्ता द्विजोत्तमा: | वशिष्ठमन्नुवन् सर्वे त्वं नो ब्रूहि सनातनम् ।। नाहं जानामि विप्रेन्द्रा: प्रत्युवाच स तानू् प्रभु: । तदनन्तर उन वादी और प्रतिवादियोंमें मूलभूत प्रश्नको लेकर बड़ा भारी वाद-विवाद खड़ा हो गया। उनमेंसे कितने ही क्रोधमें भरकर एक दूसरेके पात्र, दण्ड, वल्कल, मृगचर्म और वस्त्रोंको भी नष्ट करने लगे। तत्पश्चात् शान्त होनेपर वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण महर्षि वशिष्ठसे बोले--'प्रभो! आप ही हमें सनातन तत्त्वका उपदेश करें।” यह सुनकर वशिष्ठने उत्तर दिया--'विप्रवरो! मैं उस सनातन तत्त्वके विषयमें कुछ नहीं जानता” ।। ते सर्वे सहिता विप्रा नारदमृषिमब्रुवन् ।। त्वं नो ब्रूहि महाभाग तत्त्वविच्च भवानसि । तब वे सब ब्राह्मण एक साथ नारदमुनिसे बोले--“महाभाग! आप ही हमें सनातन तत्त्वका उपदेश करें; क्योंकि आप तत्त्ववेत्ता हैं! ।। नाहं द्विजा विजानामि क्व हि गच्छाम संगता: ।। इति तानाह भगवांस्तत: प्राह च स द्विजान् | को विद्वानिह लोके<स्मिन्नमोहो $मृतमद्भुतम् ।। तब भगवान् नारदने उन ब्राह्मणोंसे कहा--“विप्रगण! मैं उस तत्त्वको नहीं जानता। हम सब लोग मिलकर कहीं और चलें। इस जगत्में कौन ऐसा विद्वान् है, जिसमें मोह न हो तथा जो उस अदभुत अमृततत्त्वके प्रतिपादनमें समर्थ हो” ।। तच्च ते शुश्रुवुर्वाक्यं ब्राह्मणा हरशरीरिण: । सनद्धाम द्विजा गत्वा पृच्छध्व॑ं स च वक्ष्यति ।। यह बातचीत हो ही रही थी कि उन ब्राह्मणोंने किसी अदृश्य देवताकी बात सुनी --“ब्राह्मणो! सनत्कुमारके आश्रमपर जाकर पूछो। वे तुम्हें तत्त्वज्ञानका उपदेश करेंगे” ।। तमाह कश्रिद् द्विजवर्यसत्तमो विभाण्डको मण्डितवेदराशि: । कस्त्वं भवानर्थविभेदम ध्ये न दृश्यसे वाक्यमुदीरयंश्न ।। उस समय वेदराशिके ज्ञानसे सुशोभित विभाण्डक नामक किन्हीं ब्राह्मणशिरोमणिने उस अदृश्य देवतासे पूछा--“हम लोगोंमें तत्त्वके विषयमें मतभेद उत्पन्न हो गया है; ऐसी स्थितिमें आप कौन हैं, जो बात तो कर रहे हैं, किंतु दीखते नहीं हैं" ।। अथाहेदं तं भगवान् सनन्तं महामुने विद्धि मां पण्डितोडसि । ऋषिं पुराणं सततैकरूप॑ यमक्षयं वेदविदो वदन्ति । (भीष्मजी कहते हैं--राजन!) तब भगवान् सनत्कुमारने उनसे कहा--“महामुने! तुम तो पण्डित हो। तुम मुझे सदा एकरूपसे ही विचरण करनेवाला पुरातन ऋषि सनत्कुमार समझो। मैं वही हूँ, जिसे वेदवेत्ता पुरुष अक्षय बताते हैं' ।। पुनस्तमाहेदमसौ महात्मा स्वरूपसंस्थं वद आह पार्थ । त्वमेको<स्मदृषिपुड्रवाद्य न सत्स्वरूपमथवा पुन: किम् ।। कुन्तीनन्दन! तब उन महात्मा विभाण्डकने पुनः उनसे कहा--'आदिमुनिप्रवर! आप अपने स्वरूपका परिचय दीजिये। केवल आप ही हमसे विलक्षण जान पड़ते हैं, आपका स्वरूप हमारे सामने प्रत्यक्ष नहीं है। अथवा यदि आपका भी कोई स्वरूप है तो वह कैसा है?' ।। अथाह गम्भीरतरानुपादं वाक््यं महात्मा हुशरीर आदि: । नते मुने श्रोत्रमुखेडपि चास्य॑ न पादहस्तौ प्रपदात्मकेन ।। तब उस अदृश्य आदि-महात्माने गम्भीर स्वरमें यह बात कही--'मुने! तुम्हारे न तो कान है, न मुख है, न हाथ है, न पैर है और न पैरोंके पंजे ही हैं ।। ब्रुवन् मुनीन् सत्यमथो निरीक्ष्य स्वमाह विद्वान मनसा निगम्य । ऋषे कथं वाक्यमिदं ब्रवीषि न चास्य मन्ता न च विद्यते चेत् ।। न शुश्रुवुस्ततस्तत् तु प्रतिवाक्यं द्विजोत्तमा: । निरीक्ष्यमाणा आकाशं प्रहसन्तस्ततस्तत: ।। मुनियोंसे बातचीत करते हुए विद्वान् विभाण्डकने अपने विषयमें जब यह सब सत्य देखा तो मन-ही-मन विचार करके कहा--“ऋषे! आप ऐसी बात क्यों कहते हैं? यदि इसको जाननेवाला या न जाननेवाला कोई न रहे, तब क्या होगा?” परंतु इसका उत्तर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको फिर नहीं सुनायी दिया। वे हँसते हुए आकाशकी ओर देखते ही रह गये ।। आश्षचर्यमिति मत्वा ते ययुर्हैमं महागिरिम् | सनत्कुमारसंकाशं सगणा मुनिसत्तमा: ।। 'यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है” ऐसा मानकर वे सभी मुनिश्रेष्ठ दल-बलसहित सुवर्णमय महागिरि मेरुपर सनत्कुमारजीके पास गये ।। त॑ पर्वतं समारुह्म ददृशुर्थ्यानमाश्रिता: । कुमार देवमर्हन्तं वेदपाराविवर्जितम् ।। उस पर्वतपर आरूढ़ हो ध्यानका आश्रय ले उन ऋषियोंने पूजनीय देव सनत्कुमारको देखा, जो निरन्तर वेदके पारायणमें लगे हुए थे ।। ततः संवत्सरे पूर्णे प्रकृतिस्थं महामुनिम् । सनत्कुमारं राजेन्द्र प्रणिपत्य द्विजा: स्थिता: ।। आगतान् भगवानाह ज्ञाननिर्धूतकल्मष: । ज्ञातं मया मुनिगणा वाक््यं तदशरीरिण: ।। कार्यमद्य यथाकामं पृच्छध्व॑ मुनिपुज्रवा: । राजेन्द्र! एक वर्ष पूर्ण होनेपर जब महामुनि सनत्कुमार प्रकृतिस्थ हुए, तब वे ब्राह्मण उन्हें प्रणाम करके खड़े हो गये। ज्ञानसे जिनके सारे पाप धुल गये थे, उन भगवान् सनत्कुमारने वहाँ पधारे हुए ऋषियोंसे कहा--“मुनिगण! अदृश्य देवताने जो बात कही है, वह मुझे ज्ञात है; अतः आज आपलोगोंके प्रश्नोंका उत्तर देना है। मुनिवरो! आप इच्छानुसार प्रश्न करें ।। तमनब्रुवन् प्राउजलयो महामुनिं द्विजोीत्तमं ज्ञाननिधि सुनिर्मलम् | कथं वयं ज्ञाननिर्धि वरेण्यं यक्ष्यामहे विश्वरूपं कुमार ।। (भीष्मजी कहते हैं--) तब उन ब्राह्मणोंने हाथ जोड़कर परम निर्मल ज्ञाननिधि द्विजश्रेष्ठ महामुनि सनत्कुमारसे कहा--“कुमार! हमलोग ज्ञानके भण्डार और सर्वश्रेष्ठ विश्वरूप परमेश्वरका किस प्रकार यजन करें? ।। प्रसीद नो भगवन् ज्ञानलेशं मधु प्रयाताय सुखाय सन्त: । यत् तत्पदं विश्वरूपं महामुने तत्र ब्रृहि कि कुत्र महानुभाव ।। “भगवन्! महामुने! महानुभाव! आप हमपर प्रसन्न होइये और हमें ज्ञानरूपी मधुर अमृतका लेशमात्र दान दीजिये; क्योंकि संत अपने शरणागतोंको सदा सुख देते हैं। वह जो विश्वरूप पद है, वह कया है? यह हमें बताइये” ।। स तैर्वियुक्तो भगवान् महात्मा यः संगवान् सत्यवित् तच्छृणुष्व । उनके इस प्रकार विशेष अनुरोध करनेपर परब्रह्म परमात्मामें आसक्तचित्त सत्यवेत्ता महात्मा भगवान् सनत्कुमारने जो कुछ कहा, उसे सुनो ।। अनेकसाहस्रकलेषु चैव प्रसन्नधातुं च शुभाज्ञया सत् ।। वे अनेक सहस्र ऋषियोंके बीचमें बैठे थे। उन्होंने उनके शुभ निवेदनसे सत्स्वरूप आनन्दमय परमेश्वरका इस प्रकार प्रतिपादन प्रारम्भ किया ।। यथाह पूर्व युष्मासु हाशरीरी द्विजोत्तमा: । तथैव वाकक््यं तत् सत्यमजानन्तश्न कीर्तितम् ।। सनत्कुमार बोले--द्विजोत्तमो! आपलोगोंके बीचमें पहले अदृश्य देवताने जो कुछ कहा था, उनका वह कथन उसी रूपमें सत्य है। आपलोगोंने उसे न जानते हुए ही उसके साथ वार्तालाप किया था ।। शृणुध्वं परमं कारणमस्ति । स एव सर्व विद्वान् बिभेति न गच्छति । कुत्राहं कस्य नाहं केन केनेत्यवर्तमानो विजानाति । सुनिये, वह विश्वरूप परमात्मा सबका परम कारण है। जो उस सर्वस्वरूप परमेश्वरको जानता है, वह न तो भयभीत होता है और न कहीं जाता है। मैं कहाँ हूँ? किसका हूँ? किसका नहीं हूँ? किस-किस साधनसे कार्य करता हूँ? इत्यादि विचारोंमें न पड़कर परमात्माको अनुभव करता है ।। स युगतो व्यापी । स पृथक् स्थित: । तदपरमार्थम् | वह परमात्मा युग-युगमें व्यापक है। वह जडात्मक प्रपंचसे अत्यन्त भिन्न रूपमें पृथक् स्थित है। उस परमात्मासे भिन्न जो कोई भी जड वस्तु है, उसकी पारमार्थिक सत्ता नहीं है ।। यथा वायुरेक: सन् बहुधेरित: | यथावद् द्विजे मृगे व्याप्रे च । मनुजे वेणुसंश्रयो भिद्यते वायुरथैंक: । आत्मा तथासौ परमात्मासावन्य इव भाति । जैसे वायु एक होकर भी अनेक रूपोंमें संचरित होता है। पक्षी, मृग, व्याप्र और मनुष्यमें तथा वेणुमें यथार्थ रूपसे स्थित होकर एक ही वायुके भिन्न-भिन्न स्वरूप हो जाते हैं। जो आत्मा है वही परमात्मा है; परंतु वह जीवात्मासे भिन्न-सा जान पड़ता है ।। एवमात्मा स एव गच्छति । सर्वमात्मा पश्यन् शृणोति जिप्रति भाषते । इस प्रकार वह आत्मा ही परमात्मा है। वही जाता है, वह आत्मा ही सबको देखता है, सबकी बातें सुनता है, सभी गंधोंको सूँघता है और सबसे बातचीत करता है ।। चक्रेडस्य त॑ महात्मानं परितो दश रश्मय: । विनिष्क्रम्य यथासूर्यमनुगच्छति त॑ प्रभुम् ।। सूर्यदेवके चक्रमें सब ओर दस-दस किरणें हैं, जो वहाँसे निकलकर महात्मा भगवान् सूर्यके पीछे-पीछे चलती हैं ।। दिने दिने5स्तम भ्येति पुनरुद्गच्छते दिश: । तावुभौ न रवौ चास्तां तथा वित्त शरीरिणम् ।। सूर्यदेव प्रतिदिन अस्त होते और पुनः पूर्वदिशामें उदित होते हैं; परंतु वे उदय और अस्त दोनों ही सूर्यमें नहीं हैं। इसी प्रकार शरीरके अन्तर्गत अन्तर्यामीरूपसे जो भगवान् नारायण विराजमान हैं, उनको जानो (उनमें शरीर और अशरीरभाव सूर्यमें उदय-अस्तकी ही भाँति कल्पित हैं) ।। पतिते वित्त विप्रेन्द्रा भक्षणे चरणे पर: । ऊर्ध्वमेकस्तथा धस्तादेकस्तिष्ठति चापर: ।। विप्रवरो! आपलोगोंको गिरते-पड़ते, चलते-फिरते और खाते-पीते प्रत्येक कार्यके समय, ऊपर-नीचे आदि प्रत्येक देश और दिशामें एकमात्र भगवान् नारायण सर्वत्र विराज रहे हैं--ऐसा अनुभव करना चाहिये ।। हिरण्यसदन ज्ञेयं समेत्य परमं पदम् | आत्मना ह्वात्मदीपं तमात्मनि हाात्मपूरुषम् ।। उनका दिव्य सुवर्णमय धाम ही परमपद जानना चाहिये, उसे पाकर जीवन कृतार्थ हो जाता है। वह स्वयं ही अपना प्रकाशक और स्वयं ही अपने-आपमें अन्तर्यामी आत्मा है ।। संचितं संचितं पूर्व भ्रमरो वर्तते भ्रमन् योडभिमानीव जानाति न मुहारृति न हीयते ।। भौंरा पहले रसका संचय कर लेता है तब फूलके चारों ओर चक्कर लगाने लगता है, उसी प्रकार जो ज्ञानी पुरुष देहाभिमानी-जैसा बनकर लोकसंग्रहके लिये सब विषयोंका अनुभव करता है वह न तो मोहमें पड़ता है और न क्षीण ही होता है ।। न चक्षुषा पश्यति कश्ननैनं हृदा मनीषा पश्यति रूपमस्य । इज्यते यस्तु मन्त्रेण यजमानो द्विजोत्तम: ।। कोई भी उस परमात्माको अपने चर्मचक्षुओंसे नहीं देख सकता। अन्त:करणमें स्थित निर्मल बुद्धिके द्वारा ही उसके रूपको ज्ञानी पुरुष देख पाता है। उस परमात्माका मन्त्रद्वारा यजन किया जाता है तथा श्रेष्ठ द्विज ही उसका यजन करता है ।। नैव धर्मी न चाधर्मी द्वन्द्धातीतो विमत्सर: । ज्ञानतृप्त: सुखं शेते हामृतात्मा न संशय: ।। वह अमृतस्वरूप परमात्मा न धर्मी है, न अधर्मी। वह द्वन्द्*ोंसे अतीत और ईर्ष्या-द्वेषसे शून्य है। इसमें संदेह नहीं कि वह ज्ञानसे परितृप्त होकर सुखपूर्वक सोता है ।। एवमेष जगत्सृष्टिं कुरुते मायया प्रभु: । न जानाति विमूढात्मा कारणं चात्मनो हासौ ।। तथा ये भगवान् अपनी मायाद्वारा जगतकी सृष्टि करते हैं। जिसका हृदय मोहसे आच्छन्न है वह अपने कारणभूत परमात्माको नहीं जानता ।। ध्याता द्रष्टा तथा मन्ता बोद्धा दृष्टनानूस एव सः । को विद्वान् परमात्मानमनन्तं लोकभावनम् ।। यत्तु शक्यं मया प्रोक्ते गच्छथ्वं मुनिपुड्रवा: । वही ध्यान, दर्शन, मनन और देखी हुई वस्तुओंका बोध प्राप्त करनेवाला है। सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति करनेवाले उस अनन्त परमात्माको कौन जान सकता है? मुनिवरो! मुझसे जहाँतक हो सकता था मैंने इसका स्वरूप बता दिया। अब आपलोग जाइये ।। भीष्म उवाच एवं प्रणम्य विप्रेन्द्रा ज्ञानसागरसम्भवम् | सनत्कुमारं संदृश्य जग्मुस्ते रुचिरं पुन: ।। भीष्मजी कहते हैं--राजन्! इस प्रकार ज्ञानके समुद्रकी उत्पत्तिक कारणभूत मनोहर आकृतिवाले सनत्कुमारको प्रणाम करके उनका दर्शन करनेके पश्चात् वे सब ऋषि-मुनि वहाँसे चले गये ।। तस्मात् त्वमपि कौन्तेय ज्ञानयोगपरो भव । ज्ञानमेव महाराज सर्वदुःखविनाशनम् ।। अतः महाराज कुन्तीनन्दन! तुम भी ज्ञानयोगके साधनमें तत्पर हो जाओ। ऐसा ज्ञान ही सम्पूर्ण दुःखोंका विनाश करनेवाला है ।। इदं महादुःखसमाकराणां नृणां परित्राणविनिर्मितं पुरा । पुराणपुंसा ऋषिणा महात्मना महामुनीनां प्रवरेण तद् ध्रुवम् ।।) जो लोग महान् दुःखके आकर बने हुए हैं, उन मनुष्योंके परित्राणके लिये पूर्वकालमें पुराणपुरुष महात्मा महामुनिशिरोमणि नारायणऋषिने इस ज्ञानको प्रकट किया था, यह अविनाशी है ।। युधिष्ठिर उवाच यदिदं कर्म लोके5स्मिन् शुभं वा यदि वाशुभम् । पुरुषं योजयत्येव फलयोगेन भारत,यै: कश्चित् सम्मतो लोके गुणै: स्यात् पुरुषो नृषु । भवत्यनपगान् सर्वास्तान् गुणाल्लँक्षयामहे 'दैत्यराज! संसारमें जिन गुणोंको पाकर कोई भी पुरुष सम्मानित हो सकता है, उन सबको मैं आपके भीतर स्थिरभावसे स्थित देखता हूँ
yudhiṣṭhira uvāca
kecid āhur dvijā loke tridhā rājan anekadhā |
na pratyayo na cānyac ca dṛśyate brahma naiva tat ||
nānāvidhāni śāstrāṇi yuktāś caiva pṛthagvidhāḥ |
kim adhiṣṭhāya tiṣṭhāmi tan me brūhi pitāmaha ||
ユディシュティラは言った。「王よ、この世では、学識あるバラモンの中に、実在を三つに分けて説く者もいれば、さまざまに多様な形で説く者もおります。確かな確信は得られず、他に明らかに見えるものもなく、至上のブラフマンは直接には顕れません。 聖典は多種多様で、それぞれが自らの論拠に支えられ、異なる方法で説き示されています。ゆえに、祖父よ、教えてください。私はいかなる基盤—いかなる定まった立場—に拠って立ち、生きるべきでしょうか。」
युधिष्ठिर उवाच
The verse frames a classic Mahābhārata concern: when authoritative teachings conflict and the Absolute is not directly perceptible, one should seek a stable basis (adhiṣṭhāna) for life and practice. It motivates Bhīṣma’s subsequent guidance—moving from mere debate among doctrines toward a lived grounding in knowledge, discernment, and a practicable path aligned with dharma.
In Śānti Parva, Yudhiṣṭhira—troubled by competing metaphysical accounts (twofold, threefold, or many principles) and by the indirectness of Brahman—asks Bhīṣma to clarify which standpoint he should adopt. This question sets up the ensuing instruction (including the Sanatkumāra-related teaching in the chapter) that addresses confusion born of doctrinal plurality.