Śrī–Indra–Bali Saṃvāda: The Departure and Fourfold Placement of Lakṣmī
यदर्थ धर्मसंसर्ग: कर्मणां च फलोदय: । तमनाश्चवासिकं मोहं विनाशि चलमशध्चुवम्,उन्होंने कहा--'“जिसके लिये धर्मका आचरण किया जाता है, जो कर्मोके फलका उदय होनेपर प्राप्त होता है, वह इहलोक या परलोकका भोग नश्चर है। उसपर आस्था करना उचित नहीं। वह मोहरूप, चंचल और अस्थिर है”
彼は言った。「人がダルマを行ずるのも、業の果が現れて得られるのも—この世であれ来世であれ—その享楽は無常である。そこに信を置くべきではない。それは迷妄であり、移ろい、揺らぎ、定まらぬものだ。」
भीष्म उवाच