बलीन्द्रसंवादः — Kāla, Anityatā, and the Limits of Agency
Mahābhārata 12.217
उभौ नित्यावविचलौ महदृभ्यश्न महत्तरौ । सामान्यमेतदुभयोरेवं हान्यद्विशेषणम्,ये प्रकृति और पुरुष (जीवात्मा) दोनों ही अनादि और अनन्त हैंः। दोनों ही अलिंग निराकार हैं तथा दोनों ही नित्य, अविचल और महानसे भी महान हैं। ये सब बातें इन दोनोंमें समानरूपसे पायी जाती हैं; परंतु इनमें जो अन्तर या वैलक्षण्य है, वह दूसरा ही है, जिसे बताया जाता है
ubhāv nityāv avicalau mahadṛbhyaś ca mahattarau | sāmānyam etad ubhayor evaṁ hy anyad viśeṣaṇam ||
ビーシュマは言った。「両者(プラクリティとプルシャ)はともに常住にして不動であり、それぞれ“大いなるもの”をも超えて大いなる。これらの性質は両者に共通する。だが、両者を分かつ決定的な差別は別にあり、それが次に説き明かされる。」
भीष्म उवाच