Adhyāya 214: Tapas Redefined—Perpetual Discipline, Hospitality, and the Ethics of Eating (तपः-निरूपणम्, विघसाशी-अतिथिप्रिय-धर्मः)
स्वप्नेड5प्येवं यथा भ्येति मन:संकल्पजं रज: । शुक्रे संकल्पजं देहात् सृजत्यस्य मनोवहा,जैसे स्वप्नमें संसर्ग न होनेपर भी मनके संकल्पसे उत्पन्न हुआ स्त्रीविषयक राग उपस्थित हो जाता है, उसी प्रकार मनोवहा नाड़ी पुरुषके शरीरसे संकल्पजनित वीर्यका नि:सारण कर देती है
ビーシュマは言った。「夢においては、交わりがなくとも、心の決意(サンカルパ)から生じた女への欲染が現れる。まさにそのように、『マノーヴァハー』の脈道は、サンカルパにより生じた精を男の身より放出させる。」
भीष्म उवाच