Bṛhaspati’s Counsel on Contentment
Santoṣa), Restraint, and Adroha (Non-injury
संतोषो वै स्वर्गतम: संतोष: परमं सुखम् | तुष्टेन किंचित् परत: सा सम्यक् प्रतितिष्ठति,“राजन! मनुष्यके मनमें संतोष होना स्वर्गकी प्राप्तिसे भी बढ़कर है। संतोष ही सबसे बड़ा सुख है। संतोष यदि मनमें भलीभाँति प्रतिष्ठित हो जाय तो उससे बढ़कर संसारमें कुछ भी नहीं है
「王よ、人の心に満ちる足るを知ることは、天界を得ることにも勝る。足るを知ることこそ至上の安楽である。それが心に正しく堅く据わるなら、この世にそれを超えるものはない。」
देवस्थान उवाच