Yoga, Nārāyaṇa as Supreme Principle, and the Emanation of Categories
Sāṅkhya-Yoga Outline
न चक्षुषा पश्यति रूपमात्मनो न पश्यति स्पर्शनमिन्द्रियेन्द्रियम् । न श्रोत्रलिड्रं श्रवणेन दर्शन तथा कृतं पश्यति तद् विनश्यति,मनुष्य नेत्रोंद्वारा आत्माके रूपका दर्शन नहीं कर सकता। त्वचा नामक इन्द्रिय उसका स्पर्श नहीं कर सकती; क्योंकि वह इन्द्रियोंकी भी इन्द्रिय अर्थात् उनका प्रकाशक है। उस आत्माके स्वरूपका श्रवणेन्द्रियके द्वारा श्रवण नहीं हो सकता; क्योंकि वह शब्दरहित है। ज्ञानविषयक विचारसे जब आत्माका साक्षात्कार किया जाता है, तब उसके साधनोंका बाध हो जाता है
na cakṣuṣā paśyati rūpam ātmano na paśyati sparśanam indriyendriyam | na śrotrendriyaṁ śravaṇena darśanaṁ tathā kṛtaṁ paśyati tad vinaśyati ||
ビーシュマは言った。「自己(アートマン)の姿は眼によって見られない。触覚の器官である皮膚もそれに触れることはできない――自己とは、諸感官そのものを照らし出す内なる力だからである。耳もまた聴聞によってそれを捉えることはできない。かの自己は音を超えているからだ。分別の智によって自己が直証されるとき、通常の認識の道具は退き去る。なぜなら、それらが掴むものは滅びゆくものにすぎないからである。」
भीष्म उवाच