प्रजापतयः देवगणाश्च दिशि-दिशि स्थिताः ऋषयः
Prajāpatis, Deva-Groups, and the Ṛṣis Assigned to the Directions
गुणात्मकं कर्म वदन्ति वेदा- स्तस्मान्मन्त्रो मन्त्रपूर्व हि कर्म । विधिरविधियं मनसोपपत्ति: फलस्य भोक्ता तु तथा शरीरी,वेदोंका कहना है कि कर्म त्रिगुणात्मक होते हैं अर्थात् सात्विक, राजस और तामस भेदसे तीन प्रकारके होते हैं; इसीलिये मन्त्र भी सात्त्विक आदि भेदसे तीन प्रकारके ही होते हैं; क्योंकि मन्त्रोच्चारणपूर्वक ही कर्मका अनुष्ठान किया जाता है। इसी तरह उन कर्मोंकी विधि, विधेय (उनके लिये किया जानेवाला कार्य), मनके द्वारा अभीष्ट फलकी सिद्धि और उसका भोक्ता देहाभिमानी जीव--ये सभी तीन-तीन प्रकारके होते हैं
guṇātmakaṃ karma vadanti vedās tasmān mantro mantrapūrva hi karma | vidhir avidhiyaṃ manasopapattiḥ phalasya bhoktā tu tathā śarīrī ||
ビーシュマは言った。ヴェーダは、行為は三つのグナ(guṇa)より成ると宣言する。ゆえにマントラもまたそれに応じた類がある。儀礼の行いは、マントラの唱誦を先として初めて執り行われるからである。同様に、規範と非規範(正しい作法と誤った作法)、望む結果へ導く心の決意、そして果を受け味わう具身の自己—これらもまたグナに従って三様である。
भीष्म उवाच