धर्मसूक्ष्मे त्यागप्रधान्यविचारः
Subtle Dharma and the Primacy of Renunciation
कुछ तर्कवादी पण्डित भी अपने पूर्वजन्मके दृढ़ संस्कारोंसे प्रभावित होकर ऐसे मूढ़ हो जाते हैं कि उन्हें शास्त्रके सिद्धान्तको ग्रहण कराना अत्यन्त कठिन हो जाता है। वे आग्रहपूर्वक यही कहते रहते हैं कि “यह (आत्मा, धर्म, परलोक, मर्यादा आदि) कुछ नहीं है! ।। अनृतस्यावमन्तारो वक्तारो जनसंसदि | चरन्ति वसुधां कृत्स्नां बावदूका बहुश्रुता:,किंतु बहुत-से ऐसे बहुश्रुत, बोलनेमें चतुर और विद्वान् भी हैं, जो जनताकी सभामें व्याख्यान देते और उपर्युक्त असत्य मतका खण्डन करते हुए सारी पृथ्वीपर विचरते रहते हैं
anṛtasya avamantāraḥ vaktāraḥ jana-saṃsadi | caranti vasudhāṃ kṛtsnāṃ bāvadūkā bahuśrutāḥ ||
ユディシュティラは言った。「公の集会には、声高で口達者—多くを読み多くを知る—しかも真実を侮る者がいる。彼らは全土を遍歴し、虚偽を言い立て、ダルマと正しい規範を支える定めの教えを嘲り続ける。」
युधिछिर उवाच