Varṇa-lakṣaṇa and Ātma-saṃyama (Marks of Social Conduct and Self-Restraint) | वर्णलक्षणम् एवं आत्मसंयमः
सम्मान-अपमान, लाभ-हानि तथा उन्नति-अवनति--ये पूर्वजन्मके कर्मोके अनुसार बार-बार प्राप्त होते हैं और प्रारब्धभोगके पश्चात् निवृत्त हो जाते हैं ।। आत्मना विदहितं दुःखमात्मना विहितं सुखम् | गर्भशय्यामुपादाय भुज्यते पौर्वदेहिकम्,दुःख अपने ही किये हुए कर्मोका फल है और सुख भी अपने ही पूर्वकृत कर्मोंका परिणाम है। जीव माताकी गर्भशय्यामें आते ही पूर्वशरीरद्वारा उपार्जित सुख-दुःखका उपभोग करने लगता है
bhīṣma uvāca | ātmanā vidhitaṃ duḥkham ātmanā vihitaṃ sukham | garbhaśayyām upādāya bhujyate paurvadehikam ||
ビーシュマは言った。「誉れと辱め、得と失、栄えと衰え——これらは前生の業に従って幾度も訪れ、定められた分(プラーラブダ)を味わい尽くせば退いてゆく。苦は自らが作り、楽もまた自らが作る。生きものは母胎の床に宿るその瞬間から、前の身において積んだ苦楽の果を受け始めるのだ。」
भीष्म उवाच