योउत्यन्तं प्रतिगृह्लीयाद् यश्च दद्यात् सदैव हि | तयोस्त्वमन्तरं विद्धि श्रेयांस्ताभ्यां क उच्यते,“जो बराबर दूसरोंसे दान लेता (भिक्षा ग्रहण करता) तथा जो निरन्तर स्वयं ही दान करता रहता है, उन दोनोंमें क्या अन्तर है और उनमेंसे किसको श्रेष्ठ कहा जाता है? यह आप समझिये
「常に他より施しを受け取る者(乞う者)と、常にみずから施す者—この二者の隔たりをよく知り、そのうち誰がより勝ると称されるかを悟れ。」
अजुन उवाच