त्रिवर्गविचारः
Tri-varga Deliberation: Dharma, Artha, Kāma
संन्यस्य सर्वकर्माणि संन्यस्य विधिवत् तपः । संन्यस्य विविधा विद्या: सर्व संन्यस्य चैव ह,जिसका आचार-विचार शुद्ध और अन्त:करण निर्मल है, जिसकी कामनाएँ शुद्ध हैं तथा जो भोगोंसे पराड्मुख हो चुका है, वह आत्मज्ञानी पुरुष सम्पूर्ण कर्मोका, तपस्याका तथा नाना प्रकारकी विद्याओंका विधिवत् संन्यास (त्याग) करके सर्वत्यागी संन्न्यासी होकर इहलोकमें सम्मानित हो परलोकमें अक्षय स्वर्ग (ब्रह्मधाम) को प्राप्त होता है
saṁnyasya sarvakarmāṇi saṁnyasya vidhivat tapaḥ | saṁnyasya vividhā vidyāḥ sarvaṁ saṁnyasya caiva ha ||
ビーシュマは言った。「一切の行為を捨て、法にかなって苦行(タパス)さえも捨て、さらに多くの学芸の諸分野をも捨て――かくしてすべてを捨てた者は、万物を捨てる出離者となる。行いと思いが清らかで、内なる器官が浄められ、願いも清く、感官の享楽から背を向けた自己(アートマン)の知者は、この世で尊ばれ、来世において不滅の天界――ブラフマンの住処――に至る。」
भीष्म उवाच