Adhyāya 159 — Dāna–Dakṣiṇā, Āpaddharma Measures, and Prāyaścitta Classifications
ये न हृष्यन्ति लाभेषु नालाभेषु व्यथन्ति च । निर्ममा निरहंकारा: सत्त्वस्था: समदर्शिन:,तात! जो लाभमें हर्षसे फूल नहीं उठते, हानिमें व्यथित नहीं होते, ममता और अहंकारसे शून्य हैं, जो सर्वदा सत्त्वगुणमें स्थित और समदर्शी होते हैं, जिनकी दृष्टिमें लाभ- हानि सुख-दुःख, प्रिय-अप्रिय तथा जीवन-मरण समान हैं, जो सुदृढ़ पराक्रमी, आध्यात्मिक उन्नतिके इच्छुक और सत्त्वमय मार्ममें स्थित हैं, उन धर्मप्रेमी महानुभावोंकी तुम सावधान और जितेन्द्रिय रहकर सेवा-सत्कार करो। ये सब महापुरुष स्वभावसे ही बड़े गुणवान् होते हैं। शुभ और अशुभके विषयमें उनकी वाणी यथार्थ होती है। दूसरे लोग तो केवल बातें बनानेवाले होते हैं
ye na hṛṣyanti lābheṣu nālābheṣu vyathanti ca | nirmamā nirahaṅkārāḥ sattvasthāḥ samadarśinaḥ ||
ビーシュマは言った。「利を得ても歓喜に溺れず、利を失っても嘆き沈まぬ者。執着と我慢(我執)を離れ、サットヴァ(清明)に安住し、万物を平等の眼で観る者——そのような人々こそ、ダルマが称える不動の堅さを体現する。内なる均衡ゆえに、善と不善を見分けるうえで信頼できる導き手となる。彼らは私利や動揺に駆られないからである。」
भीष्म उवाच