Śaraṇāgata-Atithi-Dharma in the Kapota Narrative (कपोत-आख्यानम्—शरणागतधर्मः)
विश्वामित्र उवाच अद्याहमेतद् वृजिनं कर्म कृत्वा जीवंश्नरिष्यामि महापवित्रम् | स पूतात्मा धर्ममेवाभिपत्स्ये यदेतयोर्गुरु तद् वै ब्रवीहि,विश्वामित्र बोले--आज यह पापकर्म करके भी यदि मैं जीवित रहा तो परम पवित्र धर्मका अनुष्ठान करूँगा। इससे मेरे तन, मन पवित्र हो जायूँगे और मैं धर्मका ही फल प्राप्त करूँगा। जीवित रहकर धर्माचरण करना और उपवास करके प्राण देना--इन दोनोंमें कौन बड़ा है, यह मुझे बताओ
viśvāmitra uvāca | adyāham etad vṛjinaṃ karma kṛtvā jīvaṃśnariṣyāmi mahāpavitram | sa pūtātmā dharmam evābhipatsye yad etayor guru tad vai bravīhi ||
ヴィシュヴァーミトラは言った。「今日、たとえこの罪業をなしても、もし我が生き永らえるなら、その後に至上に清めるダルマの行を修めよう。内なる我が浄められれば、ただダルマのみを求め、その果を得るであろう。真実を告げよ—生きてダルマを行ずるのと、断食して命を捨てるのと、いずれが大いなるか。」
विश्वामित्र उवाच