Śaraṇāgata-Atithi-Dharma in the Kapota Narrative (कपोत-आख्यानम्—शरणागतधर्मः)
विश्वामित्र उवाच पिबन्त्येवोदकं गावो मण्ड्रकेषु रुवत्स्वपि । न ते5थिकारो धर्मे5स्ति मा भूरात्मप्रशंसक:,विश्वामित्र बोले--मेढकोंके टर्र-टर्र करते रहनेपर भी गौएँ जलाशयोंमें जल पीती ही हैं। (वैसे ही तुम्हारे मना करनेपर भी मैं तो यह अभक्ष्य-भक्षण करूँगा ही)। तुम्हें धर्मोपदेश देनेका कोई अधिकार नहीं है; अतः तुम अपनी प्रशंसा करनेवाले न बनो
Viśvāmitra uvāca: pibanty evodakaṃ gāvo maṇḍrakeṣu ruvatsv api | na te ’dhikāro dharme ’sti mā bhūr ātmapraśaṃsakaḥ ||
ヴィシュヴァーミトラは言った。「池で蛙が鳴き立てようとも、牛は変わらず水を飲む。これと同じく、あなたが異を唱えても、私は決めたとおりに進む。あなたにダルマをもって私を教え諭す権威はない。ゆえに自らを讃える者となるな。」
विश्वामित्र उवाच