Draupadī’s Exhortation on Rājadharma and Daṇḍa (द्रौपद्याः राजधर्मोपदेशः)
अमरप्रतिमा: सर्वे शत्रुसाहा: परंतपा: । एको<पि हि सुखायैषां मम स्यादिति मे मति:,पुरुषसिंह! शत्रुओंको संताप देनेवाले आपके ये सभी भाई शत्रु-सैनिकोंका वेग सहन करनेमें समर्थ हैं, देवताओंके समान तेजस्वी हैं, मेरा विश्वास है कि इनमेंसे एक वीर भी मुझे पूर्ण सुखी बना सकता है, फिर ये मेरे पाँचों नरश्रेष्ठ पति क्या नहीं कर सकते हैं? शरीरको चेष्टाशील बनानेमें सम्पूर्ण इन्द्रियोंका जो स्थान है, वही मेरे जीवनको सुखी बनानेमें इन सबका है
amarapratimāḥ sarve śatrusahāḥ paraṃtapāḥ | eko 'pi hi sukhāyaiṣāṃ mama syād iti me matiḥ, puruṣasiṃha |
ヴァイシャンパーヤナは言った。「彼らは皆、不死の神々にも比すべき輝きを備え、敵の猛攻に耐え、仇を苦しめる者たちである。おお、人中の獅子よ! この英雄たちのうち一人でさえ、わが生を十全の幸福へと導くに足ると、私は確信している。ましてや人中最勝たる五人、わが夫君たちが、何を成し得ぬというのか。身体を動かすために諸根がそれぞれ欠かせぬ座を占めるように、わが生を満ち足らせ幸福にするためにも、彼ら一人ひとりが欠くべからざる位置を占めているのだ。」
वैशम्पायन उवाच