Adhyāya 115: On Restraint Under Verbal Provocation in the Assembly (सभायां आक्रोश-सहिष्णुता)
प्राकृतो हि प्रशंसन् वा निन्दन् वा कि करिष्यति । वने काक इवाबुद्धिर्वाशमानो निरर्थकम्,जैसे वनमें कौआ व्यर्थ ही काँव-काँव किया करता है, उसी तरह मूर्ख मनुष्य भी अकारण ही निन्दा करता है। वह प्रशंसा करे या निन्दा, किसीका क्या भला या बुरा करेगा? अर्थात् कुछ भी नहीं कर सकेगा
prākṛto hi praśaṁsan vā nindan vā kiṁ kariṣyati | vane kāka ivābuddhir vāśamāno nirarthakam ||
ビーシュマは言った。「粗野で愚かな者が、称賛や非難によっていったい何を成し遂げられようか。森の中の烏がむなしく鳴き立てるように、無智の者は目的もなく騒ぎ立てる。褒めようと貶そうと、誰かに真の益や害をもたらすことはできぬ。」
भीष्म उवाच