Baka Dālbhya at Avakīrṇa-tīrtha: Rāṣṭra-kṣaya and Release through Prasāda (Śalya-parva, Adhyāya 40)
स निर्विण्णस्ततो राजंस्तपस्तेपे महातपा: । ततो वै तपसा तेन प्राप्य वेदाननुत्तमान्,नरेश्वर! इससे महातपस्वी आर्टरिषेण खिन्न एवं विरक्त हो उठे, फिर उन्होंने सरस्वतीके उसी तीर्थमें जाकर बड़ी भारी तपस्या की। उस तपके प्रभावसे उत्तम वेदोंका ज्ञान प्राप्त करके वे ऋषिश्रेष्ठ विद्वान वेदज्ञ और सिद्ध हो गये। तदनन्तर उन महातपस्वीने उस तीर्थको तीन वर प्रदान किये--
sa nirviṇṇas tato rājan tapas tepe mahātapāḥ | tato vai tapasā tena prāpya vedān anuttamān nareśvara |
ヴァイシャṃパーヤナは言った。「その大苦行者は、失意して世への執着を離れ、王よ、苦行(タパス)に身を投じた。そしてその苦行の力により、人の主よ、比類なきヴェーダを得て、聖なる知に通じた最上のリシとなり、霊的成就をも遂げたのである。」
वैशग्पायन उवाच