अध्याय १ — न्यग्रोधवनोपवेशनम् तथा द्रौणिनिश्चयः
Night at the Banyan and Drauṇi’s Resolve
नामृष्यन्त महेष्वासा: क्रोधामर्षवशं गता: । राज्ञो वधेन संतप्ता मुहूर्त समवस्थिता:,दो ही घड़ीमें उस स्थानसे कुछ दूर जाकर क्रोध और अमर्षके वशीभूत हुए वे महाधनुर्धर योद्धा प्याससे पीड़ित हो गये। उनके घोड़े भी थक गये। उनके लिये यह अवस्था असहा हो उठी थी। वे राजा दुर्योधनके मारे जानेसे बहुत दुःखी हो एक मुहूर्ततक वहाँ चुपचाप खड़े रहे
nāmṛṣyanta maheṣvāsāḥ krodhāmarṣavaśaṁ gatāḥ | rājño vadheṇa santaptā muhūrtaṁ samavasthitāḥ ||
サञ्जャヤは言った。耐えがたく、怒りと傷ついた誇りに支配されたその大弓手たちは、王が討たれた悲しみに胸を焦がしつつ、一瞬のあいだ沈黙して立ち尽くした。その沈黙は静かな自制ではない。ドゥルヨーダナの死ののち、憤怒と屈辱が力を蓄える、張りつめて燻る間隙であり、やがて続く報復の暴力がもたらす倫理の闇を告げるものであった。
संजय उवाच