पुनर्द्यूत-समाह्वानम्
Renewed Summons to the Dice-Game and Exile Wager
लंबे-लंबे केशोंवाली वह द्रौपदी यद्यपि सनाथा थी, तो भी दुःशासन उस बेचारी आर्त अबलाको अनाथकी भाँति घसीटता हुआ सभाके समीप ले आया और जैसे वायु केलेके वृक्षको झकझोरकर झुका देता है, उसी प्रकार वह द्रौपदीको बलपूर्वक खींचने लगा ।। सा कृष्यमाणा नमिताड़्यष्टि: शनैरुवाचाथ रजस्वलास्मि । एकं च वासो मम मन्दबुद्धे सभां नेतुं नाहसि मामनार्य,दुःशासनके खींचनेसे द्रौपदीका शरीर झुक गया। उसने धीरेसे कहा--'ओ मन्दबुद्धि दुष्टात्मा दुःशासन! मैं रजस्वला हूँ तथा मेरे शरीरपर एक ही वस्त्र है। इस दशामें मुझे सभामें ले जाना अनुचित है”
sā kṛṣyamāṇā namitāṅgayaṣṭiḥ śanair uvāca atha rajasvalāsmi | ekaṃ ca vāso mama mandabuddhe sabhāṃ netuṃ nārhasi mām anārya ||
引きずられるままに、ドロウパディーの細身の体は低く折れ伏した。やがて彼女は静かに言った。「私は月の穢れの時にあり、身にまとうのはただ一枚の衣のみ。愚鈍なる者よ——卑しき者よ——私を सभा(サバー)の場へ連れてゆく権利はない。」
दुर्योधन उवाच