अध्याय ६४ — सभामध्ये क्रोध-निवारणम्
Restraint of wrath in the royal assembly
2: छा 5 - कुरुकुलके एक पूर्वपुरुष । चतुष्षष्टितमो<5 ध्याय: दुर्योधनका विदुरको मा और विदुरका उसे चेतावनी ना दुर्योधन उवाच परेषामेव यशसा श्लाघसे त्वं सदा क्षत्त: कुत्सयन् धार्तराष्ट्रानू | जानीमहे विदुर यत् प्रियस्त्व॑ बालानिवास्मानवमन्यसे नित्यमेव,दुर्योधन बोला--विदुर! तुम सदा हमारे शत्रुओंके ही सुयशकी डींग हाँकते रहते हो और हम सभी धूृतराष्ट्रके पुत्रोंकी निन्दा किया करते हो। तुम किसके प्रेमी हो, यह हम जानते हैं, हमें मूर्ख समझकर तुम सदा हमारा अपमान ही करते रहते हो
duryodhana uvāca | pareṣām eva yaśasā ślāghase tvaṃ sadā kṣattaḥ kutsayan dhārtarāṣṭrān | jānīmahe vidura yat priyas tvaṃ bālān ivāsmān avamanyase nityam eva ||
ドゥルヨーダナは言った。「おおクシャッター(ヴィドゥラ)よ、お前はいつも我らの敵の名声ばかりを誇り、持国王の子らを絶えず貶める。ヴィドゥラよ、お前の情がどこにあるかは我らが知っている。お前は我らを子どものように見なし、常に侮っているのだ。」
दुर्योधन उवाच