Samrāt-Lakṣaṇa and the Counsel to Check Jarāsandha (सम्राट्-लक्षणं जरासन्ध-प्रतिबाधा-परामर्शः)
प्रियाण्याचरत: प्रह्वदान् सदा सम्बन्धिनस्तत: । भजतो न भजत्यस्मानप्रियेषु व्यवस्थित:,हम सदा उनका प्रिय करते रहते हैं, उनके प्रति नम्रता दिखाते हैं और उनके सगे- सम्बन्धी हैं; तो भी वे हम-जैसे अपने भक्तोंको तो नहीं अपनाते हैं और हमारे शत्रुओंसे मिलते-जुलते हैं
我らは常に彼の喜ぶことを行い、つねに恭順を示し、しかも縁者である。だがそれでも、彼は我らのような忠実な者を受け入れず、かえって我らの敵と交わり、彼らに与している。
श्रीकृष्ण उवाच