अर्जुन प्राह दाशार्ह: प्रहस्य पुरुषर्षभ: । अयं सरथ आयाति श्वेताश्वः शल्यसारथि:,संजय कहते हैं--राजन्! सीमाको लाँधकर आगे बढ़ते हुए महासागरके सदृश विशालकाय कर्ण गर्जना करता हुआ आगे बढ़ा। वह देवताओंके लिये भी दुर्जय था। उसे आते देख दशार्हकुलनन्दन पुरुषश्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्णने हँसकर अर्जुनसे कहा--'पार्थ! जिसके सारथि शल्य हैं और रथमें श्वेत घोड़े जुते हैं, वही यह कर्ण रथसहित इधर आ रहा है
sañjaya uvāca | arjuna prāha dāśārhaḥ prahasya puruṣarṣabhaḥ | ayaṃ saratha āyāti śvetāśvaḥ śalyasārathiḥ ||
サンジャヤは言った。そのときダーシャールハのクリシュナ——人中の雄牛——は微笑み、アルジュナに告げた。「見よ、彼が戦車とともに近づく。白馬を繋ぎ、御者はシャリヤである者だ。」
संजय उवाच