द्रोणपर्व — अध्याय ९०: हार्दिक्यस्य पराक्रमः
Kṛtavarmā’s Stand against the Pāṇḍavas
शूलपाणिरिवाक्षोभ्यो वरुण: पाशवानिव । युगान्ताग्निरिवार्चिष्मान् प्रधक्ष्यन् वै पुनः प्रजा:,तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए यमराज, वज्रधारी इन्द्र, दण्डधारी असह्य अन्तक, कालप्रेरक मृत्यु, किसीसे भी क्षुब्ध न होनेवाले त्रिशूलधारी रुद्र, पाशधारी वरुण तथा पुनः समस्त प्रजाको दग्ध करनेके लिये उठे हुए ज्वालाओंसे युक्त प्रलयकालीन अग्निदेवके समान दुर्धर्ष वीर अर्जुन युद्धस्थलमें अपने श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो गाण्डीव धनुषकी टंकार करते हुए नवोदित सूर्यके समान प्रकाशित होने लगे। वे क्रोध, अमर्ष और बलसे प्रेरित होकर आगे बढ़ रहे थे। उन्होंने ही पूर्वकालमें निवातकवच नामक दानवोंका संहार किया था। वे जय नामके अनुसार ही विजयी होते थे। सत्यमें स्थित होकर अपने महान् व्रतको पूर्ण करनेके लिये उद्यत थे। उन्होंने कवच बाँध रखा था। मस्तकपर जाम्बूनद सुवर्णका बना हुआ किरीट धारण किया था। उनके कमरमें तलवार लटक रही थी। वे नरस्वरूप अर्जुन नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णका अनुसरण करते हुए सुन्दर अंगदों (बाजूबन्द) और मनोहर कुण्डलोंसे सुशोभित हो रहे थे। उन्होंने श्वेत माला और श्वेत वस्त्र पहन रखे थे
sañjaya uvāca | śūlapāṇir ivākṣobhyo varuṇaḥ pāśavān iva | yugāntāgnir ivārciṣmān pradhakṣyan vai punaḥ prajāḥ |
サンジャヤは言った。三叉戟を執るルドラのごとく揺るがず、羂索を持つヴァルナのごとく、また万物を再び焼き尽くすために立ち上がる劫末の火のごとく燃え盛って—抗しがたい勇士アルジュナは戦場に現れた。優れた戦車に乗り、ガーンディーヴァを轟かせ、昇りたての太陽のように輝いた。怒りと義憤と力に駆られ、真実に堅く立って大いなる誓願を果たすべく、彼は前へと進んだ。
संजय उवाच
The verse frames martial power within ethical intention: Arjuna’s terrifying, cosmic-like energy is not mere rage but disciplined force aimed at fulfilling a solemn vow while remaining grounded in truth. It highlights how inner restraint and purpose are meant to govern even overwhelming strength in war.
Sañjaya depicts Arjuna entering the battlefield in a heightened state—radiant, unshakable, and formidable—likened to major deities and the fire of cosmic dissolution. The imagery signals a decisive turn: Arjuna advances with intense resolve, ready to carry out his pledged objective.