द्रोणाभिमुखानां निवारण-युद्धम् / Interceptions on the Droṇa-front
#फ्सपान () आकजअा+- ३. नीलकण्ठी टीकामें अश्व-शास्त्रके अनुसार घोड़ोंके रंग और लक्षण आदिका परिचय दिया गया है। उसमेंसे कुछ आवश्यक बातें यहाँ यथास्थान उद्धृत की जाती हैं। सारंगका रंग सूचित करनेवाला रंग इस प्रकार है-- सितनीलारुणो वर्ण: सारंगसदृशश्व सः । २. कबूतरका रंग बतानेवाला वचन यों मिलता है-- पारावतकपोताभ: सितनीलसमन्वयात् | 3. काम्बोज (काबुल)-के घोड़ोंका लक्षण-- महाललाटजघनस्कन्धवक्षोजवा हया: । दीर्घग्रीवायता हस्वमुष्का: काम्बोजका: स्मृता: ।। जिनके ललाट, जाँघें, कंधे, छाती और वेग महान् होते हैं, गर्दन लम्बी और चौड़ी होती है तथा अण्डकोष बहुत छोटे होते हैं, वे काबुली घोड़े माने गये हैं। $. जिस घोड़ेके ललाटके मध्यभागमें ताराके समान श्वेत चिह्न हो, उसके उस चिह्लका नाम ललाम है। उससे युक्त अश्व भी ललाम ही कहलाता है। यथा-- श्वेत ललाटमध्यस्थं तारारूपं हयस्य यत् | ललाम॑ चापि तत्प्राहुर्ललामो<श्वस्तदन्वित: ।। २. हरि” का लक्षण इस प्रकार दिया गया है-- सकेशराणि रोमाणि सुवर्णाभानि यस्य तु । हरि: स वर्णतो<श्वस्तु पीतकौशेयसंनिभ: ।। जिसकी गर्दनके बड़े-बड़े बाल और शरीरके रोएँ सुनहरे रंगके हों, जो रंगमें रेशमी पीताम्बरके समान जान पड़ता हो, वह घोड़ा “हरि' कहलाता है। ३. सिंधु देशके घोड़ोंकी गर्दन लम्बी, मूत्रेन्द्रिय मुँहउतक पहुँचनेवाली, आँखे बड़ी-बड़ी, कद ऊँचा तथा रोएँ सूक्ष्म होते हैं। सिंधी घोड़े बड़े बलिष्ठ होते हैं, जैसा कि बताया गया है-- दीर्घग्रीवा मुखालम्बमेहना: पृथुलोचना: । महान्तस्तनुरोमाणो बलिन: सैन्धवा हया: ।। २. पद्मवर्णका परिचय इस प्रकार दिया गया है-- सितरक्तसमायोगात् पद्मवर्ण: प्रकीर्त्यते । सफेद और लाल रंगोंके सम्मिश्रणसे जो रंग होता है, वह पद्मवर्ण कहलाता है। 3. बाह्लिक देशके घोड़े भी प्राय: काबुली घोड़ोंके समान ही होते हैं। उनमें विशेषता इतनी ही है कि उनका पीठभाग काम्बोजदेशीय घोड़ोंकी अपेक्षा बड़ा होता है। जैसा कि निम्नांकित वचनसे स्पष्ट है-- काम्बोजसमसंस्थाना बाह्ठविजाताश्न वाजिन: । विशेष: पुनरेतेषां दीर्घपृष्ठाड्गतोच्यते ।। ४. जिनके रोएँ तथा केसर (गर्दनके बाल) सफेद होते हैं, त्वचा, गुह्म॒भाग, नेत्र, ओठ और खुर काले होते हैं, ऐसे घोड़ोंको महर्षियोंने क्रौंचवर्णका बताया है। यथा-- सितलोमकेसराढ्या: कृष्णत्वग्गुह्दलोचनोष्ठखुरा: । ये स्युर्मुनिभिर्वाहा निर्दिष्टा: क्रौज्चवर्णास्ति ।। > ये वसुदान २१।५५ में मारे गये वसुदानसे भिय्न हैं। इन्हें कहीं-कहीं “काश्य'बताया गया है। सम्भाव है, ये ही काशिराज हों। > यद्यपि सिंहसेन और व्याप्रदत्तके मारे जानेका वर्णन (१६।३७ में) आ चुका है। तथापि यहाँ घोड़ोंके वर्णनके प्रसंगमें संजयने सामान्यतः सबके घोड़ोंका उल्लेख कर दिया है। मृत्युसे पहले वे दोनों वैसे ही घोड़ोंपर आरूढ हो रणभूमिमें पधारे थे। - इन्हींका वर्णन पहले श्लोक ५६ में भी आ चुका है। चतुर्विशो$ध्याय: धृतराष्ट्रका अपना खेद प्रकाशित करते हुए युद्धके समाचार पूछना धृतराष्ट उवाच व्यथयेयुरिमे सेनां देवानामपि संजय । आहवे ये न्यवर्तन्त वृकोदरमुखा नृपा:,धृतराष्ट्रने कहा--संजय! भीमसेन आदि जो-जो नरेश युद्धमें लौटकर आये थे, ये तो देवताओंकी सेनाको भी पीड़ित कर सकते हैं
dhṛtarāṣṭra uvāca |
vyathayeyur ime senāṁ devānām api sañjaya |
āhave ye nyavartanta vṛkodaramukhā nṛpāḥ ||
ドリタラーシュトラは言った。「サञ्जयよ、ヴリコーダラ(ビーマ)を先頭に、戦から戻って来たこれらの王たちは、神々の軍勢さえ揺るがし苦しめ得る。何が起こったのか、告げよ。」
धृतराष्ट उवाच
The verse highlights how fear and moral uncertainty intensify in war: Dhṛtarāṣṭra measures events by power and threat, revealing his anxious dependence on Sañjaya’s truthful report and his awareness that formidable warriors can overwhelm even seemingly invincible forces.
At the opening of Droṇa Parva, Adhyāya 24, Dhṛtarāṣṭra questions Sañjaya about the battlefield situation, noting that the kings led by Bhīma who have returned from combat appear capable of troubling even the gods’ armies—implying a significant and alarming turn in the fighting.