कर्ण-पाण्डव-संमर्दः — Karṇa and Arjuna’s Intensified Engagement
ततो भीम: स्मरन् क्लेशानक्षदूते वनेडपि च । विराटनगरे चैव दु:खं प्राप्तमरिंदम:,जूआके समय, वनवासकालमें तथा विराटनगरमें जो दुःख प्राप्त हुआ था, उसका स्मरण करके, आपके पुत्रोंने जो पाण्डवोंके राज्यों तथा समुज्ज्वल रत्नोंका अपहरण किया था, उसे याद करके, पुत्रोंसहित आपने पाण्डवोंको जो निरन्तर क्लेश प्रदान किये हैं, उन्हें ध्यानमें लाकर निरपराध कुन्तीदेवी तथा उनके पुत्रोंकोी जो आपने जला डालनेकी इच्छा की थी, सभाके भीतर आपके दुरात्मा पुत्रोंने जो द्रौपदीको महान् कष्ट पहुँचाया था, दुःशासनने जो उसके केश पकड़े थे, भारत! कर्णने जो उसके प्रति कठोर वचन सुनाये थे तथा कुरुनन्दन! आपकी आँखोंके सामने ही कौरवोंने जो द्रौपदीसे यह कहा था कि “कृष्णे! तू दूसरा पति कर ले, तेरे ये पति अब नहीं रहे, कुन्तीके सभी पुत्र थोथे तिलोंके समान निर्वीर्य होकर नरक (दुःख)-में पड़ गये हैं।! महाराज! आपके पुत्र जो द्रौपदीको दासी बनाकर उसका उपभोग करना चाहते थे तथा काले मृगचर्म धारण करके वनकी ओर प्रस्थान करते समय पाण्डवोंके प्रति सभामें आपके समीप ही कर्णने जो कटुवचन सुनाये थे और पाण्डवोंको तिनकोंके समान समझकर जो आपका पुत्र दुर्योधन उछलता-कूदता था, स्वयं सुखमयी परिस्थितिमें रहते हुए भी जो उस अचेत मूर्खने संकटमें पड़े हुए पाण्डवोंके प्रति क्रोधका भाव दिखाया था, इन सब बातोंको तथा बचपनसे लेकर अबतक आपकी ओरसे प्राप्त हुए अपने दुःखोंको याद करके शत्रुओंका दमन करनेवाले शत्रुनाशक धर्मात्मा भीमसेन अपने जीवनसे विरक्त हो उठे थे
tato bhīmaḥ smaran kleśān akṣadūte vane 'pi ca | virāṭanagare caiva duḥkhaṃ prāptam arindamaḥ ||
サञ्जयは言った。ついでビーマは、敵を屈する者として、賽の殿における苦難、森の流謫の歳月、さらにヴィラータの都で受けた艱難を思い起こし、その不義の記憶に胸の内を焼かれた。欺きと辱めと絶えぬ敵意によって重ねられた不当な苦しみの想起は、彼の決意をいよいよ堅くし、戦における報いの要請に法(ダルマ)の重みを与えた。
संजय उवाच
The verse highlights how sustained injustice and humiliation, when remembered clearly, can crystallize moral resolve. In the epic’s ethical frame, remembrance is not mere resentment: it functions as a reckoning of adharma that demands a dharmic response—especially for a kṣatriya bound to protect honor and justice.
Sañjaya reports Bhīma’s mental state on the battlefield: he recalls the Pāṇḍavas’ earlier sufferings—beginning with the dice-game, continuing through forest exile, and extending to the Virāṭa period. This remembrance intensifies his determination in the ongoing war.