कर्ण-पाण्डव-संमर्दः — Karṇa and Arjuna’s Intensified Engagement
क्रोधरक्तेक्षणौ तीव्रौ नि:श्वसन्ताविवोरगौ । शूरावन्योन्यमासाद्य ततक्षतुररिंदमौ,उन दोनोंकी आँखें लाल हो गयी थीं। दोनों ही फुफकारते हुए सर्पोके समान लंबी साँस खींच रहे थे। दोनों ही शत्रुदमन वीर उग्र हो परस्पर भिड़कर एक-दूसरेको बाणोंद्वारा क्षत- विक्षत करने लगे
二人の眼は怒りに血走り、猛々しく、まるで二匹の蛇が荒く息を吐くかのようであった。敵を屈する二人の勇士は相まみえるや、矢をもって互いを傷つけ、裂き合いながら激突した。
संजय उवाच