द्रोणपर्व (अध्याय ११२) — कर्णभीमयोर्युद्धम्, दुर्योधनस्य रक्षणादेशः
Droṇa-parva 112: Karṇa–Bhīma Engagement and Duryodhana’s Protective Order
त्वामेव पुरुषव्याप्रं लोके सन्त: प्रचक्षते । इस जगत्में भीष्म और द्रोणके बाद तुझ पुरुषसिंह सात्यकिको ही श्रेष्ठ पुरुष सम्पूर्ण युद्धकलामें निपुण बताते हैं ।। ९४ ई ।। (सदेवासुरगन्धर्वान् सकिन्नरमहोरगान् । योधयेत् स जगत् सर्व विजयेत रिपून् बहुन् ।। इति ब्रुवन्ति लोकेषु जनास्तव गुणान् सदा । समागमेषु जल्पन्ति पृथगेव च सर्वदा ।।) जब अच्छे पुरुषोंका समाज जुटता है, उस समय उसमें आये हुए सब लोग संसारमें तुम्हारे गुणोंको सदा-सर्वदा सबसे विलक्षण ही बतलाते हैं। उनका कहना है कि सात्यकि देवता, असुर, गन्धर्व, किन्नर तथा बड़े-बड़े नागोंसहित बहुसंख्यक शत्रुओंपर विजय पा सकते हैं। सम्पूर्ण जगत्से अकेले ही युद्ध कर सकते हैं। नाशक्यं विद्यते लोके सात्यकेरिति माधव,माधव! लोग कहते हैं कि संसारमें सात्यकिके लिये कोई कार्य असाध्य नहीं है। महाबली वीर! सब लोगोंकी तथा मेरी और अर्जुनकी-दोनों भाइयोंकी तुम्हारे विषयमें बड़ी उत्तम भावना है। अतः मैं तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसका पालन करो। महाबाहो! तुम हमारी पूर्वोक्त धारणाको बदल न देना। समरांगणमें प्यारे प्राणोंका मोह छोड़कर निर्भयके समान विचरो
tvām eva puruṣavyāpram loke santaḥ pracakṣate |
ユディシュティラは言った。「この世で、善良にして見識ある人々が、有能なる男たちの中の第一と称えるのは、ただ汝ひとりである。徳ある者の集いでは、汝の卓越は比類なきものとして語られる——天神、阿修羅、乾闥婆、緊那羅、そして大蛇の群れにも等しい大軍に対してさえ、汝は立ち向かい、なお勝ち得ると人々は言う。ゆえに、ああマーダヴァよ、世は宣する――サーティヤキに不可能はない、と。だからこそ、万人が、そして我とアルジュナが汝に寄せる高き敬意にかけて、我が願いを成せ。先の決意から退くな。命への執着を捨て、戦場において恐れなき堅固さをもって進め。」
युधिष्ठिर उवाच
The passage reinforces kṣatriya-dharma: a warrior should act with steadfast courage, free from paralyzing attachment to life, and uphold a chosen resolve. Public praise here functions ethically as a call to responsibility—great ability must be matched by unwavering conduct in crisis.
In the Drona Parva’s intense war setting, Yudhiṣṭhira addresses Sātyaki, extolling his unmatched martial prowess (even beyond legendary beings) and urging him to maintain fearless determination on the battlefield, aligning his actions with the Pāṇḍavas’ expectations and strategy.