भीष्मशिबिरगमनम् — Duryodhana’s Visit to Bhīṣma’s Camp and the Command Appeal
ऑपन--माजल बछ। अ-छऋाज नवतितमो< ध्याय: इरावानके द्वारा शकुनिके भाइयोंका तथा राक्षस अलम्बुषके द्वारा इरावानका वध संजय उवाच वर्तमाने तथा रौद्रे राजन् वीरवरक्षये । शकुनि: सौबल: श्रीमान् पाण्डवान् समुपाद्रवत्,संजय कहते हैं--राजन्! जिस समय बड़े-बड़े वीरोंका विनाश करनेवाला वह भयंकर संग्राम चल रहा था, उसी समय सुबलपुत्र श्रीमान् शकुनिने पाण्डवोंपर आक्रमण किया इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि इरावद्धधे नवतितमो<5ध्याय: ।। ९० || इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें इरावानुका वधविषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ९० ॥/ ऑपन--माज बक। जज: - रथके नीचे रहनेवाली लकड़ीको अनुकर्ष कहते हैं, जिसके सहारे पहिये रहते हैं। > यहाँ मूलमें 'पतौ” पाठ है। व्याकरणके अनुसार “पति” शब्दका सप्तमीके एक वचनमें 'पत्यौ" रूप होता है। अतः जहाँ “पतौ” पदका प्रयोग है, वहाँ मुख्य “पति"का वाचक पति शब्द नहीं है। 'पतिरिवाचरतीति पति:” इस व्युत्पत्तिके अनुसार आचारक्विबन्त “पति” शब्दका यहाँ प्रयोग है, जिसका अर्थ है--पतिसदृश। तात्पर्य यह कि जिसके लिये कन्याका वाग्दान किया गया है, वह मनोनीत पति ही विवाहके पहलेतक “पतितुल्य” है। विवाहके बाद साक्षात् “पति' होता है। इस नागकन्याके मनोनीत पतिको गरुड़ने मार डाला था, इसीलिये “नष्टे मृते प्रव्रजिते” इस पाराशर-वचनके अनुसार उसका अर्जुनके साथ सम्बन्ध हुआ और धर्मात्मा अर्जुनने उसे पत्नीरूपसे ग्रहण किया। एकनवतितमो<ध्याय: घटोत्कच और दुर्योधनका भयानक युद्ध ध्तराष्ट्र रवाच इरावन्तं तु निहतं दृष्टवा पार्था महारथा: । संग्रामे किमकुर्वन्त तन्ममाचक्ष्व संजय
sañjaya uvāca | vartamāne tathā raudre rājan vīravarakṣaye | śakuniḥ saubalaḥ śrīmān pāṇḍavān samupādravat ||
サンジャヤは言った。「王よ、最上の勇士たちを滅ぼすあの凄惨な戦がなお荒れ狂っていたその時、スバラの子にして名高きシャクニが、パーンダヴァに向けて攻めかかった。この一句は、戦の全般的な破滅のただ中にあっても、個々の選択と策謀がなお争いを駆り立て、すでに殺戮に染まった時代に侵略の道義的重みをいっそう増すことを示している。」
संजय उवाच