Mokṣa–Saṃnyāsa–Tyāga–Guṇa-Vibhāga (Renunciation, Relinquishment, and the Three Guṇas) — Mahābhārata 6, Bhīṣma-parva
सम्बन्ध--इस प्रकार आत्माकों सब प्राणियोंमें समभावसे स्थित, निर्विकार और अकर्ता बतलाया जानेपर यह शंका होती है कि समस्त शरीरोंगें रहता हुआ भी आत्मा उनके दोषोंसे निर्लिप्त और अकर्ता कैसे रह सकता है; इस शंकाका निवारण करनेके लिये अब भगवान्ू--इस अध्यायके तीसरे श्लोकमें जो “यत्प्रभावश्च" पदसे क्षेत्रज्ञका प्रभाव युननेका संकेत किया गया था; उसके अनुसार--तीन शलोकोद्रार आत्माके प्रभावका वर्णन करते हैं-- अनादित्वान्निर्गुणत्वात् परमात्मायमव्यय:+ | शरीरस्थो5डपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते,हे अर्जुन! अनादि होनेसे और निर्गुण होनेसे यह अविनाशी परमात्मा: शरीरमें स्थित होनेपर भी वास्तवमें न तो कुछ करता है और न लिप्त ही होता हैः
arjuna uvāca | anāditvān nirguṇatvāt paramātmāyam avyayaḥ | śarīrastho 'pi kaunteya na karoti na lipyate ||
至上の自己(パラマートマン Paramātman)は無始であり、グナ(guṇa)を超えるがゆえに、不滅である。ゆえに、クンティの子よ、身体に宿っていても、真実には何ものも為さず、また汚れに染まることもない。戦場の倫理的教示において、これは内なる覚知が身体の条件や過失により汚され得ないことを明らかにし、責任を「真我が行為者である」という見立てではなく、正しい識別に据える。
अजुन उवाच