अतिथीनन्नपानेन कामैरन्यैरकिंचनान् | विदितं वेदितव्यं ते कर्तव्यमपि ते कृतम्,“अतिथियोंको अन्न और जल देकर तथा अकिंचन मनुष्योंको दूसरी-दूसरी मनचाही वस्तुएँ देकर संतुष्ट कीजिये। आपने जाननेयोग्य तत्त्वको जान लिया है। करनेयोग्य कार्यको भी पूर्ण कर लिया है
「客人(アティティ)には食と水を施して満ち足らせ、また無一物の貧しき者(アキンチャナ)には望みに応じて他の品々を与えて満たせ。知るべき理はすでに知り、なすべき務めもまた成し遂げたのだ。」
वैशम्पायन उवाच