Vāsudeva’s Upadeśa: The Inner Enemy and the Indra–Vṛtra Precedent (आत्मशत्रु-बोधः; इन्द्र-वृत्रोपाख्यानम्)
धराहरणदुर्गन्न्धो विषय: समपद्यत | शतक्रतुश्नुकोपाथ गन्धस्य विषये हते,नरेश्वर! कहते हैं, प्राचीन कालमें वृत्रासुरने समूची पृथ्वीपर अधिकार जमा लिया था। इन्द्रने देखा, वृत्रासुरने पृथ्वीपर अधिकार कर लिया और गन्धके विषयका भी अपहरण कर लिया और इस प्रकार पृथ्वीका अपहरण करनेसे सब ओर दुर्गनन््धका प्रसार हो गया है। तब गन्धके विषयका अपहरण होनेसे शतक्रतु इन्द्रको बड़ा क्रोध हुआ
dharāharaṇa-durgandho viṣayaḥ samapadyata | śatakratuś ca kupito ’bhūt gandhasya viṣaye hate, nareśvara |
風神ヴァーユは言った。「大地が奪われると、悪臭があまねく広がった。古の世、ヴリトラースラは全地をその支配下に置いたのである。インドラが、ヴリトラが大地を簒奪し、さらに『香りの領域』までも持ち去ったのを見たとき、百祭の主インドラは、王よ、激しい怒りにとらわれた。この出来事は、正しい秩序を踏みにじり—世界の調和を支えるものを奪い取る—ことが、神々の譴責を招き、万人が感じる乱れの原因となることを示している。」
वायुदेव उवाच